हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, स्लॉटर हाउस सील मामले में निर्देश जारी
जबलपुर/भोपाल। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) ने भोपाल के जिन्सी इलाके में स्थित आधुनिक स्लॉटर हाउस (कसाईखाना) को सील किए जाने के मामले में एक बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट की अवकाशकालीन एकलपीठ के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने भोपाल नगर निगमायुक्त को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में याचिकाकर्ता के आवेदन पर अगले 15 दिनों के भीतर कानून के मुताबिक विचार कर निर्णय लें।
क्या है पूरा मामला?
भोपाल के जिन्सी इलाके में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर एक आधुनिक स्लॉटर हाउस चलाया जा रहा था, जिसमें भोपाल नगर निगम खुद एक साझेदार था। दिसंबर 2025 में भोपाल पुलिस मुख्यालय के पास एक ट्रक से 26 टन गौमांस (Beef) बरामद हुआ था। जांच में सामने आया कि यह गौमांस इसी स्लॉटर हाउस का था। इसके बाद प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए स्लॉटर हाउस को सील कर दिया था और इसका संचालन करने वाले ठेकेदार असलम कुरैशी (असलम चमड़ा) व उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया था। बाद में 24 जनवरी 2026 को नगर निगम ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर ताला लगा दिया।
ठेकेदार ने कोर्ट में क्या दलील दी?
स्लॉटर हाउस का संचालन करने वाली कंपनी 'लाइव स्टॉक फूड प्रोसेसर प्राइवेट लिमिटेड' के डायरेक्टर असलम कुरैशी ने इस कार्रवाई के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से अधिवक्ता पीयूष तिवारी ने कोर्ट में निम्नलिखित तर्क रखे:
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समझौते के नियमों की अनदेखी: नगर निगम और कंपनी के बीच हुए 'कन्सेशन एग्रीमेंट' (रियायत समझौते) के तहत किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में पहले नोटिस देने, सुनवाई करने और फिर एग्रीमेंट रद्द करने की एक तय प्रक्रिया थी, लेकिन निगम ने बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए सीधे प्लांट को सील कर दिया।
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रोजगार और आर्थिक नुकसान: इस अचानक की गई कार्रवाई से कंपनी का लीगल बिजनेस तो ठप हुआ ही, साथ ही वहां काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
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आवेदन पर सुनवाई न होना: कंपनी ने इस संबंध में पहले नगर निगम को अपनी बात रखने के लिए आवेदन दिया था, लेकिन जब निगम ने उस पर कोई फैसला नहीं लिया, तब उन्हें हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में राज्य सरकार की तरफ से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली और भोपाल नगर निगम की तरफ से वकील एस.एम. गुरु ने पैरवी की। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की पीठ ने मामले को निपटाते हुए भोपाल नगर निगमायुक्त को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता के आवेदन पर 15 दिनों के भीतर विधिसम्मत (कानून के दायरे में) फैसला लें और इस दौरान एनजीटी (NGT) के नियमों का भी ध्यान रखें।

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