आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य क्रांति, मोबाइल यूनिट से मरीजों को राहत
रायपुर: छत्तीसगढ़ के दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए संचालित 'मोबाइल मेडिकल यूनिट' (एमएमयू) आज ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। विशेष रूप से सुदूर एवं नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के लिए यह योजना किसी चलते-फिरते अस्पताल से कम नहीं है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, अब तक प्रदेश के इन दुर्गम क्षेत्रों में 5500 से अधिक चिकित्सा शिविर आयोजित किए जा चुके हैं, जिनके माध्यम से लगभग 1,16,000 मरीजों को निशुल्क उपचार प्रदान किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि इस पहल ने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया है, बल्कि ग्रामीणों के मन में शासन की स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति विश्वास भी जगाया है।
विशेषज्ञों की टीम और अत्याधुनिक जांच सुविधाओं का संगम
प्रदेश भर में सक्रिय 57 मोबाइल मेडिकल यूनिट्स में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा गया है। प्रत्येक यूनिट में एक प्रशिक्षित एमबीबीएस डॉक्टर, नर्स और लैब तकनीशियन की टीम तैनात रहती है, जो मौके पर ही मरीजों का परीक्षण करती है। इन वाहनों में 25 से अधिक प्रकार की लैब जांचों की आधुनिक सुविधा उपलब्ध है, जिससे मरीजों को जांच रिपोर्ट के लिए अब शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ती। विशेष रूप से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए प्रसव पूर्व जांच और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान कर उन्हें उचित उपचार दिया जा रहा है। बच्चों में कुपोषण की स्क्रीनिंग के साथ-साथ डायरिया, निमोनिया और अस्थमा जैसी बीमारियों का इलाज भी इन इकाइयों के माध्यम से सुलभ हो गया है।
गंभीर बीमारियों की समय पर पहचान और गांव में ही मुफ्त इलाज
इन यूनिटों की सहायता से अब मलेरिया, टीबी, कुष्ठ और ओरल कैंसर जैसी घातक बीमारियों की पहचान प्रारंभिक स्तर पर ही संभव हो पा रही है। इसके अलावा सिकल सेल और मोतियाबिंद के मरीजों की स्क्रीनिंग कर उन्हें उचित परामर्श दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर देखा जाता था कि लोग सामान्य बीमारियों के लिए भी शहर जाने में संकोच करते थे, लेकिन अब बीपी, शुगर और हीमोग्लोबिन जैसी जरूरी जांचें उनके दरवाजे पर ही हो रही हैं। डॉक्टरों के परामर्श के साथ-साथ मरीजों को मौके पर ही निशुल्क दवाएं वितरित की जा रही हैं, जिससे ग्रामीणों के समय और धन दोनों की बड़ी बचत हो रही है और उन्हें एक ही स्थान पर संपूर्ण चिकित्सा लाभ मिल रहा है।
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम और मुनादी से बढ़ता जन-विश्वास
इस योजना की सफलता का एक बड़ा आधार इसका सुव्यवस्थित प्रबंधन है, जिसके तहत शिविरों की तिथि और स्थान एक महीने पहले ही तय कर दिए जाते हैं। ग्रामीणों तक सूचना पहुंचाने के लिए गांवों में बाकायदा ढोल बजाकर मुनादी कराई जाती है, ताकि अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति भी इस सुविधा से वंचित न रहे। गरियाबंद के देवभोग, कांकेर के भानुप्रतापपुर, कबीरधाम के बोडला और नारायणपुर के ओरछा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में इन शिविरों को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। पहले जहाँ अस्पताल जाने में लोगों का पूरा दिन खर्च हो जाता था, वहीं अब पारा-मोहल्लों में ही इलाज की सुविधा उपलब्ध होने से स्वास्थ्य सेवाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है।

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