अंतिम पल में टला खतरा: भारतीय जहाज होर्मुज से सुरक्षित बाहर निकला
तेहरान। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। लेबनान पर इज़राइली सेना की लगातार बमबारी से असंतुष्ट होकर ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को यातायात के लिए पूरी तरह बंद करने का फैसला किया है। हालांकि, इस नाकेबंदी से ठीक पहले भारत के लिए एक बड़ी राहत की खबर आई है। भारतीय ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े चार जहाज ईरान के इस कड़े कदम से ऐन पहले सुरक्षित रूप से इस मार्ग को पार करने में सफल रहे हैं, जिससे देश की एनर्जी सुरक्षा पर मंडरा रहा तत्काल खतरा टल गया है।
भारतीय जहाजों की सुरक्षित वापसी और उनका महत्व
ईरान द्वारा जलमार्ग बंद किए जाने से ठीक पहले जो 55 जहाज वहां से रवाना हुए, उनमें भारत आ रहा एलएनजी (LNG) से लदा एक प्रमुख जहाज 'अल हामरा' भी शामिल है। सुरक्षा कारणों से इस जहाज ने संवेदनशील इलाकों से गुजरते समय अपनी ट्रैकिंग प्रणाली को बंद कर दिया था। यह जहाज संयुक्त अरब अमीरात की राष्ट्रीय तेल कंपनी से 1 लाख 32 हजार 890 क्यूबिक मीटर गैस लेकर तमिलनाडु के एन्नोर टर्मिनल की तरफ बढ़ रहा है। दक्षिण भारत के ऊर्जा संकट को दूर रखने और वहां मौजूद बिजली व खाद कारखानों को चालू रखने के लिए इस कार्गो का समय पर पहुंचना बेहद जरूरी है। भारत अपनी आवश्यकता का 10 से 15 प्रतिशत एलएनजी अबू धाबी से जबकि सबसे बड़ा हिस्सा (40 से 45 फीसदी) कतर से आयात करता है।
कच्चे तेल के तीन अन्य टैंकरों का सफर
केंद्रीय मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, 'अल हामरा' के अलावा भारतीय ध्वज वाले तीन अन्य बड़े कच्चे तेल के टैंकर भी 94 भारतीय क्रू मेंबर्स के साथ होर्मुज जलमार्ग को पार कर सुरक्षित आगे बढ़ चुके हैं। इन जहाजों में कुल मिलाकर 8.6 लाख टन से अधिक कच्चा तेल लदा हुआ है। इन तीनों जहाजों के भारत पहुंचने का विवरण इस प्रकार है:
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देश वैभव: इसके 24 जून को वाडीनार बंदरगाह पहुंचने की उम्मीद है।
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देश विभोर: इसके भी 24 जून को सिक्का बंदरगाह पर लंगर डालने की संभावना है।
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सनमार हेराल्ड: इस तीसरे टैंकर के 1 जुलाई तक पारादीप बंदरगाह पहुंचने का अनुमान है।
ईरान की चेतावनी और शांति बहाली के प्रयास
ईरान के सैन्य मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज को बंद करने का फैसला विरोधी देशों द्वारा किए गए वादों को तोड़ने और लेबनान पर हमलों के विरोध में लिया गया पहला कदम है। यदि परिस्थितियां नहीं सुधरीं, तो ईरान आगे और भी कड़े कदम उठा सकता है। इस बीच, खाड़ी देशों में शांति बहाल करने के लिए स्विट्जरलैंड के एक रिसॉर्ट में अमेरिका और ईरान के शीर्ष प्रतिनिधियों के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी शुरू हो चुकी है। हालांकि, मौजूदा सत्र में यह बातचीत कुछ हद तक रुक सी गई है, लेकिन दोनों पक्षों के राजनयिकों को फिर से चर्चा की मेज पर लाने के लिए परदे के पीछे से प्रयास (बैकचैनल संपर्क) लगातार किए जा रहे हैं।

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