झारखंड हाई कोर्ट ने अफसरों को दिया बड़ा झटका, कहा- 'अब अपनी जेब से भरें मुआवजा'; जानें क्यों लिया गया यह कड़ा एक्शन?
घर टूटे तो मुआवजा जरूरी—इस सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) की जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण से जुड़े मामले में सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जिन लोगों के घर तोड़े गए हैं, वे मुआवजे के पूरे हकदार हैं और प्रशासनिक चूक का बोझ आम नागरिकों पर नहीं डाला जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पीड़ित परिवारों को राहत देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि मुआवजे की राशि राज्य के खजाने से नहीं दी जाएगी, बल्कि उन अधिकारियों से वसूली की जाएगी जिनकी लापरवाही या गलत फैसलों के कारण यह स्थिति बनी। कोर्ट ने राज्य सरकार को दोषी अधिकारियों की पहचान कर उनसे राशि वसूलने और प्रभावित लोगों को मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि रिम्स के लिए लगभग 60 साल पहले जमीन का विधिवत अधिग्रहण हो चुका था। इसके बावजूद करीब सात एकड़ जमीन पर अवैध निर्माण होता रहा। अदालत ने कहा कि इस गंभीर अनियमितता के लिए सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई विभाग जिम्मेदार हैं। इसमें रिम्स प्रबंधन, जिला प्रशासन, रांची नगर निगम, झारखंड राज्य आवास क्षेत्र से जुड़े अधिकारी, बिल्डर, जमीन मालिक और फ्लैट के लिए लोन मंजूर करने वाले बैंक अधिकारी भी शामिल हैं।
घर टूटे तो मुआवजा जरूरी फैसले को और सख्त बनाते हुए हाईकोर्ट ने पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। साथ ही एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को विस्तृत जांच कर यह पता लगाने का निर्देश दिया गया है कि किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई। अदालत ने कहा कि सरकारी जमीन पर निर्माण और उस पर बैंक लोन की स्वीकृति बेहद गंभीर मामला है, जिसे किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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