ज्ञान : अमृत की तरह हैं ‘जे. कृष्णमूर्ति’ की ये बातें जिन्हें जानकर हो जाएंगे तृप्त

चित्र सौजन्य : जे कृष्णमूर्ति, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक वक्ता।

  • अमित कुमार सेन।

जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था, ‘संसार विनाश की राह पर आ चुका है और इसका हल तथाकथित धार्मिक लोगों और राजनीतिज्ञों के पास नहीं है।’ 12 मई, 1895 में जन्में जे. कृष्णमूर्ति दार्शनिक और आध्यात्मिक विषयों के बड़े ही कुशल एवं परिपक्व लेखक थे।

उनके अनुसार दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है यथार्थवादी और स्पष्ट मार्ग पर चलना। जे. कृष्णमूर्ति कहते थे, ‘आपके भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए, तब आप एक साफ और स्पष्ट आकाश देखने के लिए तैयार हो जाते हैं। आप धरती का हिस्सा नहीं, आप स्वयं आकाश हैं। यदि आप कुछ भी हैं, तो फिर आप कुछ नहीं।’

कृष्णमूर्ति की शिक्षा गहरे ध्यान अध्ययन, सटीक ज्ञान और श्रेष्ठ व्यवहार की ओर इंगित करती है। उनका कहना था, ‘आपने जो कुछ भी परम्परा, देश और काल से जाना है उससे मुक्त होकर ही आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएंगे। जीवन का परिवर्तन सिर्फ इसी बोध में निहित है कि आप स्वतंत्र रूप से सोचते ‘हैं’ या ‘नहीं’ और आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं, कि नहीं।’

उन्होंने कहा था, ‘अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है। सच को ढूंढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है।’

तमिलनाडु के एक छोटे-से शहर में निर्धन ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ। वह माता-पिता की आठवीं संतान थे इसीलिए उनका नाम कृष्णमूर्ति रखा गया। पिता ‘जिद्दू नारायनिया’ ब्रिटिश प्रशासन में सरकारी कर्मचारी थे। जब कृष्णमूर्ति केवल 10 साल के ही थे, तभी इनकी माता ‘संजीवामा’ का निधन हो गया।

बचपन से ही वह असाधारण प्रतिभा के धनी थे। जे कृष्णमुर्ति के बारे में थियोसोफ़िकल सोसाइटी ने जन्म से पहले ही विश्वगुरु के आगमन की भविष्यवाणी की थी। एनी बेसेंट ने जे. कृष्णमूर्ति को किशोरावस्था में गोद ले लिया और इस तरह उनकी परवरिश धर्म और आध्यात्म से ओत-प्रोत वातावरण में हुई।

‘हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठें, मान लें कि बहुत स्वतंत्र हो गए हैं, परंतु गहराई में देखें तो हम रूढ़िवादी हैं। इसमें कोई संशय नहीं है क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर संबंधों को इन्हीं के आधार पर स्थापित किया है। यह बात उतनी ही पुरातन है जितनी कि ये पहाड़ियां। यह हमारी एक रीति बन गई हैं। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं, और इसी से एक दूसरे को यातनाएं देते हैं। तो क्या इस रीति को रोका जा सकता है?’

जे कृष्णमूर्ति कहते थे, ‘आपने जो कुछ भी परम्परा, देश और काल से जाना है उससे मुक्त हो जाएं तभी आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएंगे। जीवन का परिवर्तन सिर्फ इसी बोध में निहित है कि आप स्वतंत्र रूप से सोचते हैं कि नहीं और आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं कि नहीं।’

ध्यान का अर्थ है विचार का अंत हो जाना और तभी एक अलग तरह का आयाम प्रकट होता है, जो समय से परे है। ध्यानपूर्ण मन शांत होता है। यह मौन विचार की कल्पना और समझ से परे है। यह मौन किसी निस्तब्ध संध्या की नीरवता भी नहीं है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिमाओं सहित पूर्णत: विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है। यह ध्यानपूर्ण मन ही धार्मिक मन है, ‘धर्म’, जिसे कोई मंदिर, गिरजाघर या भजन-कीर्तन छू भी नहीं पाता।

‘किसी चीज को सहज रूप से जैसी वह है, वैसी ही देखना यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है क्योंकि हमारे दिल और दिमाग बहुत ही जटिल हैं और हमने सहजता का गुण खो दिया है।’

धार्मिक मन प्रेम का विस्फोटक है। यह प्रेम किसी भी अलगाव को नहीं जानता। इसके लिए ‘दूर’, निकट है। यह ‘ना’ एक है ‘ना’ अनेक, यही प्रेम की अवस्था है, जिसमें सारा विभाजन समाप्त हो चुका होता है। सौंदर्य की तरह उसे भी शब्दों के द्वारा नहीं मापा जा सकता। इस मौन से ही एक ध्यानपूर्ण मन का सारा क्रियाकलाप जन्म लेता है।

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